जिसे मनुष्य सर्वापेक्षा अपना समझ भरोसा करता है, जब उसी से अपमान और तिरस्कार प्राप्त हो, मन वितृष्णा से भर जाता है; एकदम मर जाने की इच्छा होने लगती है; इसे शब्दों में बता सकना सम्भव नहीं।
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जिसे मनुष्य सर्वापेक्षा अपना समझ भरोसा करता है, जब उसी से अपमान और तिरस्कार प्राप्त हो, मन वितृष्णा से भर जाता है; एकदम मर जाने की इच्छा होने लगती है; इसे शब्दों में बता सकना सम्भव नहीं।
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उन दिनों चारों ओर यह खबर फैल गई कि रूपनारायण-नद के ऊपर रेल का पुल बनेगा, परंतु पुल का काम रुका पड़ा है, इसका कारण यह है कि पुल की देवी तीन बच्चों की बलि चाहती है, बलिदान दिए बिना पुल नहीं बन सकता। तत्पश्चात् खबर फैली कि दो बच्चे पकड़कर जीवित ही पुल के खंभे के नीचे गाड़ दिए गए. हैं, अब केवल एक लड़के की खोज है, उसके मिल जाने पर पुल तैयार हो जाएगा। यह भी सुना गया कि रेलवे-कंपनी के आदमी लड़के की खोज में शहर तथा गाँवों में चक्कर लगा रहे हैं। कोई नहीं कह सकता कि वे कब कहाँ जा पहुँचेंगे, उन्हें पहचानना कठिन है, क्योंकि उनमें से कोई भिखारी के वेश में है, कोई साधु- संन्यासी का बाना धारण किए हुए है और कोई गुंडों-डकैतों की भाँति लाठी बाँधे घूम रहा है। यह अफवाह बहुत दिनों से फैली हुई थी, अत: आसपास के ग्राम-निवासी अत्यधिक भयभीत थे एवं संदेह का यह हाल था कि वे हर किसी को रेलवे-कंपनी का लड़का पकड़नेवाला आदमी ही समझ बैठते थे। प्रत्येक यही समझता था कि अबकी बार उसकी ही बारी है, संभवत: उसी का बच्चा पकड़कर पुल के नीचे गाड़ दिया जाएगा।
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‘भेड़िया क्या है’, खारू बंजारे ने कहा, ‘मैं अकेला पनेठी से एक भेड़िया मार सकता हूँ।’ मैंने उसका विश्वास कर लिया। खारू किसी चीज से नहीं डर सकता और हालाँकि 70 के आस-पास होने और एक उम्र की गरीबी के सबब से वह बुझा-बुझा सा दिखाई पड़ता था; पर तब भी उसकी ऐसी बातों का उसके कहने के साथ ही यकीन करना पड़ता था। उसका असली नाम शायद इफ्तखार या ऐसा ही कुछ था; पर उसका लघुकरण ‘खारू’ बिलकुल चस्पाँ होता था। उसके चारों ओर ऐसी ही दुरूह और दुर्भेद्य कठिनता थी। उसकी आँखें ठंडी और जमी हुई थीं और घनी सफेद मूँछों के नीचे उसका मुँह इतना ही अमानुषीय और निर्दय था जितना एक चूहेदान।
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"सत्यानाश हो उस हरामी के पिल्ले का, जिसने ऐसी जान लेवा चीज बनाई!" ...खाली बोतल को हिला हिलाकर शंकर इस तरह जोर-जोर से चिल्ला रहा था, जिससे कि रसोई में काम करती हुई उसकी पत्नी सुन ले। "घर का घर तबाह हो जाए, आदमी की जिन्दगी तबाह हो जाये; पर यह जालिम तरस नहीं खाती! कैसा मूर्ख होता है आदमी भी, यह समझता है वह इसे पी रहा है; पर असल में यह आदमी को पीती है, आदमी की जान को, आदमी के खून को पीती है उसके ईमान को पीती है, हाँ-हाँ!" यों ही बकता-बहकता, खाली बोतल की मुग्दर घुमाता हुआ शंकर रसोई के दरवाजे पर पहुँच गया, "देखा, यह खाली हो गई?" और बोतल को उलटी करते हुए बोला, "एक दम खाली! अब मैं चाहता हूँ कि मैं इसे भरूँ और पिऊँ और यह कम्बख्त चाहती है कि यह मेरे पेट में भर जाये और मुझे पिये! ...पियें... दोनों खूब पियें!"
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जैसे से ही उस विशाल भवन का कुछ भाग दिखाई दिया, जीवन ने कहा, 'देखो, वह है...पूरा एयरकंडीशंड है।' फिर वह स्वयं ही संकुचित-सा हुआ, सत्या एयरकंडीशंड का मतलब क्या समझेगी। वह समझाने लगा, 'देखो, अभी कितनी गर्मी है। वहाँ पहुँचोगी, तो ऐसा लगेगा. जैसे किसी ठंडे पहाड़ पर आ गई हो।' परंतु वह फिर संकुचित हुआ, सत्या ठंडा पहाड़ भी क्या समझेगी। क्या वह कभी वहां गई है? और वह खुद भी कहां गया है। उसने भी तो केवल सुना ही है कि पहाड़ ठंडे होते हैं। अमीर लोग गर्मियों में पहाड़ पर चले जाते हैं।
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