यदि पक्षपात की दृष्टि से न देखा जाये तो उर्दू भी हिंदी का ही एक रूप है। - शिवनंदन सहाय।
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तक़दीर और तदबीर - महावीर प्रसाद द्विवेदी | Mahavir Prasad Dwivedi

तक़दीर 
यह तदबीर से बोली तक़दीर हँसकर--
नहीं कोई दुनिया में मेरे बराबर।
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समकालीन - गोरख पाण्डेय

कहीं चीख उठी है अभी 
कहीं नाच शुरू हुआ है अभी
कहीं बच्चा हुआ है अभी
कहीं फौजें चल पड़ी हैं अभी
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माँ | कविता - दिव्या माथुर

उसकी सस्ती धोती में लिपट
मैंने न जाने
कितने हसीन सपने देखे हैं
उसके खुरदरे हाथ मेरी शिकनें सँवार देते हैं
मेरे पड़ाव हैं
उसकी दमे से फूली साँसें
ठाँव हैं
कमज़ोर दो उसकी बाँहें उसकी झुर्रियों में छिपी हैं
मेरी खुशियाँ
और बिवाइयों में
मेरा भविष्य। 
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वह मैं हूँ… - ओमप्रकाश वाल्मीकि | Om Prakash Valmiki

मुँह-अँधेरे बुहारी गई सड़क में
जो चमक है–
वह मैं हूँ !
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चमकता रहूँ माँ - नरेन्द्र कुमार

चरणों की धूल, माथे पर लगाकर 
तेरी पूजा करूं मैं जिंदगी भर 
आंचल की छांव में आशीष पाकर
चमकता रहूं माँ जगमगाकर 
पालन पोषण का उपहार पाकर
समाऊं धरा में जग महकाकर 
एक फूल तेरे चरणों में सजाकर 
पूजा करूं माँ शीश झुकाकर 
चरणों की धूल माथे पर लगाकर
नमन करूं माँ शीश नवाकर
...

मैं खुद में हूँ पूरी  - सोनाली सिंह

जननी हूँ
जीवन भी मैं,
जज्बातों पर
मेरा जोर नहीं। 
सशक्त हूँ,
व साकार
भी हूँ मैं
नारी हूँ,
कमजोर नहीं। 
दरपन हूँ व
अक्स भी मैं,
झुका सके मुझे
इतना कोई सशक्त नहीं
स्वाभिमानी हूँ, व
आत्म निर्भर भी मैं।
टूट के बिखरूं अब
वो वक्त नहीं,
नहीं समझना
आधी-अधूरी
नहीं अधूरी मैं
खुद में हूँ पूरी। 
साथ चलना हो
तो हाथ बढ़ाना,
पीछे हटना
मुझे मंजूर नहीं। 
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याद  - डॉ. अनुराग कुमार मिश्र
नदी के किनारे ढलती शाम के साये में
स्कूटर पर उनका कुछ सहम कर बैठना। 

कभी कानों से सटकर रुकने को कहना
कभी पीठ पर उंगलियों से कुछ लिखना। 

हवाओं के रुख पर वो जुल्फों का उड़ना
जूड़े में कसना औ फिर उनका खुलना। 

सब्जियों के खेतों पर मन का मचलना
कभी मुझे टोकना कभी खुद सम्हलना। 

बहुत याद आता है साथ उनका चलना
हाथ कन्धे पे रखकर चढ़ना - उतरना। 

डॉ. अनुराग कुमार मिश्र
ई-मेल : dranuragmishra3@gmail.com
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डॉ हर्षा त्रिवेदी की तीन कविताएं - डॉ हर्षा त्रिवेदी

क्योंकि मैं ज़िंदा था 
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कर-जुग - नज़ीर अकबराबादी

दुनिया अजब बाज़ार है, कुछ जिन्स याँकी साथ ले, 
नेकी का बदला नेक है, बद से बदी की बात ले। 
मेवा खिला, मेवा मिले, फल-फूल दे, फल-पात ले, 
आराम दे आराम ले, दुख-दर्द दे आफ़ात ले।
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पथिक - मोहनलाल महतो वियोगी

पथिक हूँ,— बस, पथ है घर मेरा। 
बीत गए कितने युग चलते किया न अब तक डेरा। 
नित्य नया बनकर मिलता है, वही पुराना साथी, 
निश्चित सीमा के भीतर ही लगा रहा हूँ फेरा। 
हैं गतिमान सभी जड़-चेतन, थिर है कौन बता दे? 
क्षण, दिन, मास, वर्ष, ऋतु, यौवन, जीवन, विभा अँधेर 
दर्शन - पात्र एक ही जन है, क्षण क्षण रूप बदलता, 
इस नाटक में बस दो पट हैं, संध्या और सवेरा। 
"इसके बाद और भी कुछ है " यही बताकर आशा, 
लेने देती नहीं तनिक भी, मन को कहीं बसेर । 
ममते! देख दिवस ढलता है, घन घनघोर उठे हैं, 
बतला दूर यहाँ से क्या है अभी नगर वह तेरा? 
पथिक हूँ— बस, पथ है घर मेरा—
...

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