हिंदी के पुराने साहित्य का पुनरुद्धार प्रत्येक साहित्यिक का पुनीत कर्तव्य है। - पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल।
व्यंग्य
हिंदी व्यंग्य. Hindi Satire.

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तेरा न्यू ईयर तो मेरा नया साल - प्रो. राजेश कुमार

नया साल आ गया है और हमारे महाकवि इस तैयारी में है किस अभूतपूर्व और बेजोड़ तरीके से लोगों को नए साल की शुभकामनाएँ दी जाएँ कि वे बस अश-अश करते रह जाएँ। तभी उनके मन में संदेह का कीड़ा रेंगा, जिसके चलते वे हाल ही में उन्होंने लोगों को क्रिसमस दिवस मनाने को मानसिक गुलामी का प्रतीक घोषित करते हुए, तुलसी दिवस (तुलसीदास नहीं, तुलसी पौधा) की शुभकामनाएँ थी, और इसके चलते लोगों की नज़रों में हास्यास्पद बनकर रह गए थे। जाने कहाँ से किसी ने उनके पास तुलसी दिवस की जानकारी भेजी थी, जिसे राष्ट्र प्रेम के वशीभूत होकर उन्होंने इस बात को नज़रअंदाज़ करते हुए भी फ़ॉरवर्ड करने में बहुत गौरव महसूस नहीं अनुभव किया था कि उन्हें तुलसी दिवस तू याद क्रिसमस दिवस ने ही दिलाई थी, अन्यथा तुलसी भी पहले से मौजूद थी और क्रिसमस तो खैर पहले से था ही!
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ढूंढ़ते रह जाओगे | हास्य व्यंग्य - प्रेम विज

जनता और नेता का सम्बन्ध घी और खिचड़ी जैसा नहीं होता, बल्कि दुल्हा और बारात जैसा होता है। दुल्हा दुल्हन को लेकर फुर हो जाता है और बराती बेचारे खाना खाते रह जाते हैं। बरातियों की विशेषता जन की तरह होती है। बरातियों को चाहे जितना भी स्वादिष्ट भोजन परोस दिया जाए लेकिन वे उस में भी कोई न कोई नुक्स जरूर निकाल देते हैं। नेता जी भी मंत्री पद मिलते ही आलोप हो जाते हैं। जनता नेता में नुक्स निकालती रहती है। नेता जी ने चुनाव के समय चाहे जन की कितनी भी सेवा की हो, यहां तक कि पैसा पानी की तरह बहाया हो, लेकिन जन हमेशा नेता से नाखुश रहते हैं। इसलिए गद्दी मिलते ही नेता जी जन से दूर चले जाते हैं।
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सारे जहाँ से अच्छा जनतंत्र हमारा | हास्य व्यंग्य - डॉ. हरीशकुमार सिंह

दुनिया का सबसे अच्छा तंत्र अपना है। नाम है जनतंत्र। हमारे लिए बहुत गर्व का विषय है जनतंत्र क्योंकि जनतंत्र में सबको समान अवसर हैं इसलिए यह बहुत अच्छा माना जाता है। जनतंत्र में आगे बढ़ने के लिए कोई रोक - टोक किसी के लिए नहीं है इसलिए यह खूब अच्छा है। जनतंत्र में अपने रहनुमाओं को चुनने का हक भी प्रजा को है इसलिए प्रजा ही जिम्मेदार मानी जाती है कि कौन राजधानी जाएगा ,कौन नहीं। जनतंत्र में जो साधन संपन्न होकर लिख पढ़ जाते हैं और परीक्षाएं वगैरह उत्तीर्ण कर उच्च अधिकारी बन जाते हैं और एयरकंडीशंड दफ्तरों में बैठते हैं वो अपनी जगह हैं मगर अगर कभी कोई पीछे रह जाए, किसी कारण से बेचारा निरक्षर रह जाए , तो वो परीक्षा देकर क्या करेंगे , उन्हें आगे बढ़ने के अवसर कैसे मिलेंगे। वो भी लाल बत्ती में घूमना चाहते हैं। उन्होंने पैदा होकर कौन सी गलती कर डाली भला जो वो सूट बूट टाई का आनंद न ले सकें, उनका भी दबदबा क्यों न हो। इसके लिए हमारा अच्छा जनतंत्र है। जनतंत्र जात-पात, धर्म, लिंग, संपत्ति, छोटा-बड़ा, अनपढ़, पढा-लिखा, ईमानदार, बेईमान, लुच्चा-टुच्चा या सच्चा नहीं देखता बल्कि सबको एक धरातल पर रखता है, किसी से कोई भेदभाव नहीं करता, जो चाहे सो आए और जनतंत्र में पाए के सिद्धांत में विश्वास रखता है इसलिए हमारा जनतंत्र अच्छा है।
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व्यंग्य चोट करता है, गुदगुदाता है | व्यंग्य  - प्रभात गोस्वामी

साहित्य ने मुझे हमेशा आकर्षित किया है। मैं फक्कड़ भी हूँ, घुमक्कड़ भी हूँ। चिपकू भी हूँ और लपकू भी हूँ इसलिए साहित्य के लिए पूरी तरह फिट हूँ। प्यार में चोट खाकर कवि बना, फिर अपनी कहानी लिखने के लिए कहानीकार बन गया। बचपन से रुड़पट भी रहा सो यात्रा वृत्तान्त भी लिखे। मैं उस दौर का साहित्यकार हूँ जब संपादक बड़ी बेदर्दी से सर (रचना का) काटते थे और मैं कहता था – हुज़ूर अहिस्ता-अहिस्ता। कितनी ही रचनाएँ मेरी आलमारी में अस्वीकृति की पीड़ा से कराहती हुई उम्र क़ैद-सी त्रासदी का शिकार हुईं। कुछ ओझिया महाराज की कचौड़ियों के कागज़ को उपकृत करतीं रहीं। जहाँ लोग कचौड़ी और चाट के साथ मेरी रचनाओं को बड़े मन से चाटते रहे। क्या करें उन दिनों बड़े साहित्यकार घास नहीं डालते थे और सम्पादक दोस्ती नहीं करते थे। रचना छपे तो कैसे छपे?
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मजबूरी और कमजोरी - नरेन्द्र कोहली

मैं रामलुभाया के घर पहुँचा तो देख कर चकित रह गया कि वह बोतल खोल कर बैठा हुआ था।
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