हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्र निर्माण का प्रश्न है। - बाबूराम सक्सेना

यह जो बादल है | ग़ज़ल

यह जो बादल है, इक दिवाना है
उसके रहने का क्या ठिकाना है

कोख मिलती है अब किराये पर
अब तो सरोगेशी का जमाना है

भीड़ बाज़ार में बहुत है मगर
खुद को
बाज़ार से बचाना है

बह गये बाढ़ में हैं सैलानी
इस कहर को भी अब भुनाना है

हर जगह अम्न की ही बातें हों
प्यार के गांव को बसाना है

 

- डॉ० भावना

ई-मेल:  bhavnakumari52@gmail.com

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