राष्ट्रभाषा हिंदी का किसी क्षेत्रीय भाषा से कोई संघर्ष नहीं है।' - अनंत गोपाल शेवड़े

तुम्हें याद है ?

तुम्हें याद है ? नाम लिखा था तुमने मेरा नदी किनारे,
एक साँझ अपनी उँगली से भीगे हुए रेत के ऊपर :
जिसको थोड़ी देर बाद ही मिटा दिया लहरों ने आकर,
देख जिसे, जाने क्यों उस क्षण, भर आये यों नयन तुम्हारे ?

इतनी क्यों गमगीन हुई तुम ? जिसे नष्ट कर गई हिलोरें,
वह तो क्षणिक : किन्तु जिसका प्रतिरूप लिखा था मेरे मन पर,
नहीं सहज वह पायेगा मर, काल - तरंगों से टकरा कर।
फिर जाने क्या सोच तुम्हारी मुस्काई नयनों की कोरें ?

सच, उस सुख की सुधियों को हो, रूप दे रहा हैं कविता का :
वह भीगी मुसकान, नेह भीगा विश्वास तुम्हारा मुझ पर,
करता रहा सहज प्रेरित, मैं तब से लिखता रहा निरन्तर :
अब मुसकायें नयन तुम्हारे, भय न करें वे नश्वरता का !

मेरा नाम, तुम्हारी छाया-विश्वासों की जीत हमारी !
आज समय की नदी किनारे, हार रहीं लो, लहर बिचारी !

- यतेन्द्र कुमार
[ छाया के स्वर, आत्माराम एंड संस, १९६०]

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