हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्र निर्माण का प्रश्न है। - बाबूराम सक्सेना

क्यों दीन-नाथ मुझपै | ग़ज़ल

क्यों दीन-नाथ मुझपै, तुम्हारी दया नहीं ।
आश्रित तेरा नहीं हूं कि तेरी प्रजा नहीं ।।

मेरे तो नाथ कोई तुम्हारे सिवा नहीं ।
माता नहीं है बन्धु नहीं है पिता नहीं ।।

माना कि मेरे पाप बहुत है पै हे प्रभू ।
कुछ उनसे न्यूनतर तो तुम्हारी दया नहीं।।

करुणा करोगे क्या मेरे आँसू ही देखकर ।
जी का भी मेरे दुःख तो तुमसे छिपा नहीं ।।

तुम भी शरण न दोगे तो जाऊंगा मैं कहां ।
अच्छा हूं या बुरा हूं किसी और का नहीं ।।

- अज्ञात

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