हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्र निर्माण का प्रश्न है। - बाबूराम सक्सेना

इस दौर में...

इस दौर में कोई न जुबां खोल रहा है
तुझको ही क्या पड़ी है कि सच बोल रहा है

बेशक हजार बार लुटा पर बिका नहीं
कोहिनूर जहां भी रहा अनमोल रहा है

साधु की चटाई को कोई खौफ, न खतरा
हर पांव सिंहासन का मगर डोल रहा है

शोहरत के मदरसे का गणित हमसे पूछिए
जितनी है पोल उतना ही बज ढोल रहा है

- उदय प्रताप सिंह

 

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