हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्र निर्माण का प्रश्न है। - बाबूराम सक्सेना

जीवन और संसार पर दोहे

 (काव्य) 
Print this  
रचनाकार:

 रोहित कुमार 'हैप्पी' | न्यूज़ीलैंड

आँखों से बहने लगी, गंगा-जमुना साथ ।
माँ ने पूछा हाल जो, सर पर रख कर हाथ ।।

जिस्मों में तो जां नहीं, न चेहरों पर रंग ।
देख जवानी आज की, हुआ बुढ़ापा दंग ।।

जीवन को समझा नहीं, ‘रोहित' यह संसार ।
यह जीवन तो मौत ने, हमको दिया उधार ।।

जीवन में करने लगे, ‘रोहित' सभी दुकान ।
मोल-भाव में खो गया, हर इक का ईमान ।।

राँझा तो राँझा नहीं, मिले कहाँ से हीर ।
अब दिल में बसती नहीं, मीरा वाली पीर ।।

तेरा-मेरा कर रहा, ‘रोहित' यह संसार ।
चार दिनों की जिंदगी, आठ दिनों का बैर ।।

- रोहित कुमार ‘हैप्पी'

 

Back
 
Post Comment
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश