मुस्लिम शासन में हिंदी फारसी के साथ-साथ चलती रही पर कंपनी सरकार ने एक ओर फारसी पर हाथ साफ किया तो दूसरी ओर हिंदी पर। - चंद्रबली पांडेय।
विक्रमादित्य का न्याय (कथा-कहानी)    Print this  
Author:भारत-दर्शन

विक्रमादित्य का राज था। उनके एक नगर में जुआ खेलना वर्जित था। एक बार तीन व्यक्तियों ने यह अपराध किया तो राजा विक्रमादित्य ने तीनों को अलग-अलग सज़ा दी। एक को केवल उलाहना देते हुए, इतना ही कहा कि तुम जैसे भले आदमी को ऐसी हरकत शोभा नहीं देती। दूसरे को कुछ भला-बुरा कहा, और थोड़ा झिड़का। तीसरे का मुँह काला करवाकर गधे पर सवार करवा, नगर भर में फिराया।

एक दरबारी ने महाराज के न्याय का आधार जानने की विनती की, "महाराज! एक ही अपराध का दंड कम-ज्यादा क्यों? अपराध तो तीनों ने एक-सा किया है।"

राजा विक्रमादित्य ने दरबारी को तीनों की खोज़-ख़बर लेने को कहा। जानकारी मिली कि पहले आदमी, जिसे राजा ने केवल उलाहना दिया था, उसने शर्म के मारे फाँसी लगाकर अपनी जान दे दी। दूसरा आदमी, जिसे झिड़का गया था, वह नगर छोड़कर वन को चला गया। कुछ गाँव वालों का कहना था, वह अब घरबार छोड़ साधू हो गया। मगर तीसरा आदमी, जिसका नगर भर में जुलूस निकाला गया था, वह अब भी शराब के नशे में जुआ खेलता देखा गया।

विक्रमादित्य ने अपराधियों की प्रकृति को पहचान ही उनका दण्ड निर्धारित किया था।

[भारत-दर्शन संकलन]

Previous Page  |  Index Page  |   Next Page
 
Post Comment
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश