हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता'। - गोविन्दवल्लभ पंत।

कहानियां

कहानियों के अंतर्गत यहां आप हिंदी की नई-पुरानी कहानियां पढ़ पाएंगे जिनमें कथाएं व लोक-कथाएं भी सम्मिलित रहेंगी। पढ़िए मुंशी प्रेमचंद, रबीन्द्रनाथ टैगोर, भीष्म साहनी, मोहन राकेश, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, फणीश्वरनाथ रेणु, सुदर्शन, कमलेश्वर, विष्णु प्रभाकर, कृष्णा सोबती, यशपाल, अज्ञेय, निराला, महादेवी वर्मालियो टोल्स्टोय की कहानियां

Article Under This Catagory

पानी और पुल - महीप सिंह

गाड़ी ने लाहौर का स्टेशन छोड़ा तो एकबारगी मेरा मन काँप उठा। अब हम लोग उस ओर जा रहे थे जहाँ चौदह साल पहले आग लगी थी। जिसमें लाखों जल गये थे, और लाखों पर जलने के निशान आज तक बने हुए थे। मुझे लगा हमारी गाड़ी किसी गहरी, लम्बी अन्धकारमय गुफा में घुस रही है। और हम अपना सब-कुछ इस अन्धकार को सौंप दे रहे हैं।

 
पंगा - दिव्या माथुर

एक नई नवेली दुल्हन सी एक बीएमडब्ल्यू पन्ना के पीछे लहराती हुई सी चली आ रही थी, जैसे दुनिया से बेख़बर एक शराबी अपनी ही धुन में चला जा रहा हो या कि जीवन से ऊब कर किसी चालक ने स्टीरिंग-व्हील को उसकी मर्ज़ी पर छोड़ दिया हो। उसकी कार का नंबर था आर-4-जी-एच-यू जो पढ़ने में 'रघु' जैसा दिखता था। 'स्टुपिड इडियट' कहते हुए पन्ना चौकन्नी हो गई कि यह 'रघु' साहब कहीं उसका राम नाम ही न सत्य कर दें। दुर्घटना की संभावना को कम करने के लिये पन्ना ने अपनी कार की गति बढ़ा ली और अपने और उसके बीच के फासले को बढ़ा लिया।

 
रंग बदलता मौसम  - सुभाष नीरव

पिछले कई दिनों से दिल्ली में भीषण गरमी पड़ रही थी लेकिन आज मौसम अचानक खुशनुमा हो उठा था। प्रात: से ही रुक-रुक कर हल्की बूंदाबांदी हो रही थी। आकाश काले बादलों से ढका हुआ था। धूप का कहीं नामोनिशान नहीं था।
मैं बहुत खुश था। सुहावना और ख़ुशनुमा मौसम मेरी इस ख़ुशी का एक छोटा-सा कारण तो था लेकिन बड़ा और असली कारण कुछ और था। आज रंजना दिल्ली आ रही थी और मुझे उसे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर रिसीव करने जाना था। इस खुशगवार मौसम में रंजना के साथ की कल्पना ने मुझे भीतर तक रोमांचित किया हुआ था।

 
झंझट ख़त्म - शिखा वार्ष्णेय

लन्दन में जून का महीना सबसे खुशनुमा होता है। सुबह चार-पाँच बजे से दिन चढ़ आता है। खिड़की से धूप झाँकने लगती है और आप चाहकर भी सोये नहीं रह पाते हैं।

 
कृष्णा की चूड़ियाँ  - कादंबरी मेहरा

कुसुम को नए साल से पहले-पहले कानपुर पहुंचना है। भाई की इकलौती बेटी शुभा की शादी तय हो गयी है। सर पर से माँ का साया वर्षों पहले उठ गया था। शादी की तैय्यारी शुभा कैसे कर पायेगी। नानी के घर से मामा और मामी आयेंगे पर वे पुराने विचारों के लोग ठहरे। कुसुम को कम से कम पंद्रह दिन पहले तो पहुंचना ही चाहिए। दिक्कत ये है कि दिसंबर में भारत की सीट मिलना बड़ा मुश्किल होता है। इमर्जेंसी में बुक करने के दुगुने दाम। कुसुम ने पड़ोसी को अपनी परेशानी बताई तो वह चहक पड़े।

 
क़ब्र की मिट्टी - खेमराज गुप्त

"अम्माँ, छोटे भैया को क्या हो गया? वह कहाँ गया माँ? और बापू ने उसे गढ़े में क्यों दबा दिया? क्या भैया वहाँ डरेगा नहीं? उसे जब भूख लगेगी तो वह रोयेगा भी, तब उसे दूध कौन पिलायेगा अम्माँ?"

 
दुर्गा का मंदिर - मुंशी प्रेमचंद | Munshi Premchand

बाबू ब्रजनाथ कानून पढ़ने में मग्न थे, और उनके दोनों बच्चे लड़ाई करने में। श्यामा चिल्लाती, कि मुन्नू मेरी गुड़िया नहीं देता। मुन्नू रोता था कि श्यामा ने मेरी मिठाई खा ली।

 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें