भाषा विचार की पोशाक है। - डॉ. जानसन।

कहानियां

कहानियों के अंतर्गत यहां आप हिंदी की नई-पुरानी कहानियां पढ़ पाएंगे जिनमें कथाएं व लोक-कथाएं भी सम्मिलित रहेंगी। पढ़िए मुंशी प्रेमचंद, रबीन्द्रनाथ टैगोर, भीष्म साहनी, मोहन राकेश, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, फणीश्वरनाथ रेणु, सुदर्शन, कमलेश्वर, विष्णु प्रभाकर, कृष्णा सोबती, यशपाल, अज्ञेय, निराला, महादेवी वर्मालियो टोल्स्टोय की कहानियां

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शर्त - एन्तॉन चेखव

शरद की उस गहन अंधेरी रात में एक वृद्ध साहूकार महाजन अपने अध्ययनकक्ष में चहलकदमी कर रहा था। उसे याद आ रही थी 15 वर्ष पहले की शरद पूर्णिमा की वह रात जब उसने एक दावत दी थी। उस पार्टी में कई विद्वान व्यक्ति आए हुए थे और बड़ी रोचक बातचीत चल रही थी। अन्य विषयों के बीच बात मृत्यु-दंड पर आ गई। मेहमानों में कई विद्वान व्यक्ति तथा पत्रकार भी थे जो मृत्युदंड के विरोध में थे और मानते थे कि यह प्रथा समाप्त हो जानी चाहिये क्योंकि वह सभ्य समाज के लिये अशोभनीय तथा अनैतिक है। उनमें कुछ लोगों का कहना था कि मृत्युदंड के स्थान पर आजीवन कारावास की सजा पर्याप्त होनी चाहिये।

 
एडम और ईव - दिव्या माथुर

बात ज़रा सी थी; एक झन्नाटेदार थप्पड़ ईव के गाल पर पड़ा। वह संभल नहीं पाई, कुर्सी और मेज़ से टकराती हुई ज़मीन पर जा गिरी।  उसका बायां हाथ स्वतः गाल पर चला गया, लगा कि जैसे उसका चेहरा ऊबड़-खाबड़ हो गया हो।  जबाड़े की हड्डियां एक दूसरे पर चढ़ गयी थीं और दर्द के मारे उसका बुरा हाल था उसने उठने की कोशिश की, उसकी आँखों के आगे तारे घूम गए।

 
उजड़े प्यार का मसीहा - विजय कुमार तिवारी

कहानी का अंत मेरे सामने है। ऐसा ही होगा,क्या कभी मैंने सोचा था? क्या कभी मैंने कोई कल्पना की थी कि प्यार मुझे इस तरह ऐसे मोड़ पर खड़ा कर देगा और मैं थका-हारा अपना सब कुछ लुटा चुका रहूँगा। पर,आज सत्य यही है,अंत यही है। हाँ,अभी जो कुछ हुआ है,यही होना था। एक न एक दिन यह होना ही था।

 
अंझू - गुरबख्श सिंह

आंध्र में उगोल रेलवे स्टेशन के मुसाफिर खाने में बैठा गाडी की प्रतीक्षा में था। वेला सांझ की थी और दिसम्बर का सूरज सुनहले आकाश में से मुझे कमरे के द्वार में से प्लेटफार्म के पार दीख रहा था, जैसे रक्तिम कालीनों पर कोई छबीला साजन पग-पग उतर रहा हो। इधर मेरे कमरे में कोई सूरज, उभर भी तो रहा था। एक प्रेमी दम्पति एकांत छोर में बैठा अंग-अंग से मुस्करा रहा था। प्रकट में तो मैं बाहर के सूर्यास्त पर ही दृष्टि डाले बैठा था, किन्तु ध्यान मेरा अन्तरवर्ती सूर्योदय से ही जुड़ा हुआ था। अभी मेरी अन्तरात्मा से इस प्रीत नाटक की झलक के लिए कृतज्ञता की अनुभूति उभरी ही थी कि एक अनोखी मृदुल स्वर लहरी मेरे कानों में गूंज उठी। ऐसा लगा जैसे प्रेमी युगल की मौन भंगिमाएं संगीत में ढल गई हों।

 
अमावस्या की रात्रि - मुंशी प्रेमचंद | Munshi Premchand

दीवाली की संध्या थी। श्रीनगर के घूरों और खँडहरों के भी भाग्य चमक उठे थे। कस्बे के लड़के और लड़कियाँ श्वेत थालियों में दीपक लिये मंदिर की ओर जा रही थीं। दीपों से उनके मुखारविंद प्रकाशमान थे। प्रत्येक गृह रोशनी से जगमगा रहा था। केवल पंडित देवदत्त का सतधारा भवन काली घटा के अंधकार में गंभीर और भयंकर रूप में खड़ा था। गंभीर इसलिए कि उसे अपनी उन्नति के दिन भूले न थे भयंकर इसलिए कि यह जगमगाहट मानो उसे चिढ़ा रही थी। एक समय वह था जबकि ईर्ष्या भी उसे देख-देखकर हाथ मलती थी और एक समय यह है जबकि घृणा भी उस पर कटाक्ष करती है। द्वार पर द्वारपाल की जगह अब मदार और एरंड के वृक्ष खड़े थे। दीवानखाने में एक मतंग साँड़ अकड़ता था। ऊपर के घरों में जहाँ सुन्दर रमणियाँ मनोहर संगीत गाती थीं वहाँ आज जंगली कबूतरों के मधुर स्वर सुनायी देते थे। किसी अँग्रेजी मदरसे के विद्यार्थी के आचरण की भाँति उसकी जड़ें हिल गयी थीं और उसकी दीवारें किसी विधवा स्त्री के हृदय की भाँति विदीर्ण हो रही थीं पर समय को हम कुछ नहीं कह सकते। समय की निंदा व्यर्थ और भूल है यह मूर्खता और अदूरदर्शिता का फल था।

 
एक गुम-सी चोट - सुशांत सुप्रिय

कैसा समय है यह
जब बौने लोग डाल रहे हैं
लम्बी परछाइयाँ
-- ( अपनी ही डायरी से )

 

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