विदेशी भाषा में शिक्षा होने के कारण हमारी बुद्धि भी विदेशी हो गई है। - माधवराव सप्रे।
 
विडम्बना (काव्य)       
Author:रीता कौशल | ऑस्ट्रेलिया

मैंने जन्मा है तुझे अपने अंश से
संस्कारों की घुट्टी पिलाई है ।
जिया हमेशा दिन-रात तुझको
ममता की दौलत लुटाई है ।

तेरे आँसू के मोती सहेजे हमेशा
स्नेह की सुगंध से महकायी है ।
उच्च विचारों की आचार-संहिता
भी तुझे सिखाई-समझाई है ।

हर पल अपने सपनों में तेरे लिए
खुशियों की बारात सजाई है ।
फिर भी क्यों कहती है दुनिया
बेटी तू मेरी नहीं पराई है ।

साजन की दहलीज पर जब पहुँची
तब माना गया तू परजायी है ।
रीति-रिवाजों की ये क्रूर-श्रृंखला
आखिर क्यों तेरे लिए बनाई है?
आखिर किसने तेरे लिए बनाई है??

- रीता कौशल, ऑस्ट्रेलिया

 

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WA-6912 Australia
Ph: +61-402653495
E-mail: rita210711@gmail.com

 

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