देश तथा जाति का उपकार उसके बालक तभी कर सकते हैं, जब उन्हें उनकी भाषा द्वारा शिक्षा मिली हो। - पं. गिरधर शर्मा।
 
गिरमिट के समय  (काव्य)       
Author:कमला प्रसाद मिश्र | फीजी | Kamla Prasad Mishra

दीन दुखी मज़दूरों को लेकर था जिस वक्त जहाज सिधारा
चीख पड़े नर नारी, लगी बहने नयनों से विदा-जल-धारा
भारत देश रहा छूट अब मिलेगा इन्हें कहीं और सहारा
फीजी में आये तो बोल उठे सब आज से है यह देश हमारा

गिरमिट शर्त के नीचे उन्हें करना जो पड़ा वह काम कड़ा था
मंगल था लहराने लगा जहां जंगल ही सब ओर खड़ा था
जीवन घातक कोठरी में करना हर निवास पड़ा था
मौत से जूझ गये ये बहादुर साहस खूब था जोश बड़ा था

कोई रामायण बाँच रहा कोई लेकर सत्यनारायण आया
खूब किया उसका सम्मान कोई अनजान जो आँगन आया
गिरमिट वालों के साथ था मौसम रंग जमा लिया जो मन आया
खून बहाये तो फागुन आया जो आंसू बहाये तो सावन आया

खून पसीना बहाकर भी ये सभी दुख दर्द को भूल गये थे
एक दवा थी कि लेकर ये निज भारत भूमि की धूल गये थे
किंतु कभी अपमान हुआ तो ये धर्म ही के अनुकूल गये थे
माँ-बहनों की बचाने को इज्जत सैंकड़ों फाँसी पे झूल गये थे ।

                                    - कमला प्रसाद मिश्र

Back
 
 
Post Comment
 
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश