विदेशी भाषा में शिक्षा होने के कारण हमारी बुद्धि भी विदेशी हो गई है। - माधवराव सप्रे।
 
नेता (काव्य)       
Author:रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar

नेता ! नेता ! नेता !

क्या चाहिए तुझे रे मूरख !
सखा ? बन्धु ? सहचर ? अनुरागी ?
या जो तुझको नचा-नचा मारे
वह हृदय-विजेता ?
नेता ! नेता ! नेता !

मरे हुओं की याद भले कर,
किस्मत से फरियाद भले कर,
मगर, राम या कृष्ण लौट कर
फिर न तुझे मिलनेवाले हैं ।
टूट चुकी है कडी,
एक तू ही उसको पहने बैठा है ।
पूजा के ये फूल फेंक दे,
अब देवता नहीं होते हैं ।
बीत चुके हैं सतयुग-द्वापर,
बीत चुका है त्रेता ।
नेता ! नेता ! नेता !

नेता का अब नाम नहीं ले,
अंधेपन से काम नहीं ले,
हवा देश की बदल गयी है;
चाँद और सूरज, ये भी अब
छिपकर नोट जमा करते हैं ।
और जानता नहीं अभागे,
मन्दिर का देवता चोर-बाजारी में पकड़ा जाता है ?
फूल इसे पहनायेगा तू ?
अपना हाथ घिनायेगा तू ?

उठ मन्दिर के दरवाजे से,
जोर लगा खेतों में अपने,
नेता नहीं, भुजा करती है
सत्य सदा जीवन के सपने ।
पूजे अगर खेत के ढेले
तो सचमुच, कुछ पा जायेगा,
भीख याकि वरदान माँगता
पड़ा रहा तो पछतायेगा ।
इन ढेलों को तोड़,
भाग्य इनसे तेरा जगनेवाला है ।
नेताओं का मोह मूढ़ !
केवल तुमको ठगनेवाला है ।
लगा जोर अपने भविष्य का बन तू आप प्रणेता ।
नेता ! नेता ! नेता !

(1952)

- रामधारी सिंह 'दिनकर'

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