देश तथा जाति का उपकार उसके बालक तभी कर सकते हैं, जब उन्हें उनकी भाषा द्वारा शिक्षा मिली हो। - पं. गिरधर शर्मा।
 
मेरा दिल मोम सा | कविता (काव्य)       
Author:डॉ सुनीता शर्मा | न्यूज़ीलैंड

खिड़की दरवाजे लोहे के बना
बोल्ट कर लिए हैं मैंने
कोई कण धूल-सा आंखों में
ना चुभ जाए कहींl
मेरा दिल मोम सा
पिघल न जाए कहींl
बिस्तर पर भी चप्पल
उतारने से कतराती हूँ मैं
कोई फूल कांटा बनकर
ना चुभ जाए कहींl
मेरा दिल मोम सा
पिघल ना जाए कहींl
अंगुलियों में भी सुई लेकर
कपड़े सिलने से घबराती हूँ मैं
कोई याद जख्म बन
ना छिल जाए कहींl
मेरा दिल मोम सा
पिघल ना जाए कहींl

-डॉ॰ सुनीता शर्मा
 ऑकलैंड, न्यूज़ीलैंड
 ई-मेल: adorable_sunita@hotmail.com

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