कैसे निज सोये भाग को कोई सकता है जगा, जो निज भाषा-अनुराग का अंकुर नहिं उर में उगा। - हरिऔध।
 
पहाड़े (काव्य)       
Author:रोहित कुमार 'हैप्पी' | न्यूज़ीलैंड

आपके और मेरे
पहाड़े भिन्न हैं।
आपके लिए--
दो दूनी
चार।

मेरे लिए--
दो दूनी
का मतलब
केवल प्यार।

- रोहित कुमार 'हैप्पी'
   ई-मेल: editor@bharatdarshan.co.nz

 

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