कैसे निज सोये भाग को कोई सकता है जगा, जो निज भाषा-अनुराग का अंकुर नहिं उर में उगा। - हरिऔध।
 
चलो चलें उस पार (काव्य)       
Author:अमरजीत कौर कंवल | फीजी

चलों चलें उस पार
झर झर करते झरने हों जहाँ
बहती हो नदिया की धारा
जीवन के चंद पल हों अपने
कर लें हम प्रकृति से प्यार

क्या रखा परदों के पीछे
चार दीवारी के चेहरे हैं
न प्रभात की लाली दिखती
न सिंदूरी साँझ के तार

सीमित और सँगीन महल ये
अंधेरी हर मन की नगरी
कैसी ये हिलजुल चिलमन की
थक गईं पलकें पँथ निहार

न समीर सुखदायक निर्मल
तन मन पीड़ित इस नगरी में
पतझड़ सा जीवन लगता है
न जाने कब आए बहार

साँझ की किरणें ले काली चादर
डगर डगर हर नगर गाँव में
सन्नाटे की मूक वाणी से
छा जातीं हर गली-द्वार

तरस रहे हैं अधीर ये नैनां
झिलमिल तारों की पाने को
चाँदी की चुनरी जो ओढ़े
करते कुदरत का सिंगार

जुआर भावों की चढ़ चढ़ उतरे
बिजली कौंधे, घन काले छाए
दमकें, खेलें आंख मिचौली
शायद कभी तो बरसे फुहार

वन उपवन सब धुल जाएंगे
महक बिखेरे हर फुलवाड़ी
पुष्पों के मुख मोती बन कर
चमकेंगे तब वे पल चार

लौटेंगी जब मुग्ध निगाहें
परदीली दुनिया के अन्दर
कौतूहल बस मन में होगी
फिर छाएगा वही अंधियार
चलो चलें उस पार

-अमरजीत कौर कंवल, फीजी

Back
 
 
Post Comment
 
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश