जब हम अपना जीवन, जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दे तब हम किसी के प्रेमी कहे जा सकते हैं। - सेठ गोविंददास।
एकता - भारत-दर्शन संकलन  
   Author:  भारत-दर्शन संकलन

एक पिता के चार पुत्र थे। चारों में प्रायः हमेशा ही झगड़ा बना रहता। इससे उनकी शारीरिक और आर्थिक ही नहीं, मानसिक और बौद्धिक अवनति भी होती जा रही थी। यह देखकर पिता बड़ा दुखी हुआ। पिता ने मरते समय अपने पुत्रों को बुलाया और उन्हें एक लकड़ी का गट्ठर दिया और कहा, "तोड़ो इसे।"

लड़कों ने भरसक प्रयत्न किया, परंतु तोड़ न सके।

अंत में उसने कहा, "एक-एक तोड़ो" तब वे बड़े आराम से टूटने लगीं। तब पिता ने कहा, "यदि इस प्रकार मिलकर रहोगे तो कोई तुम्हारा कुछ बिगाड़ न सकेगा और यदि फूट रही तो इसी प्रकार जैसे लकड़ियाँ क्षण में ही टूट गई, वैसे ही नष्ट हो जाओगे।"

उस दिन से लड़के मिलकर रहने लगे।


[भारत-दर्शन संकलन]

 
 

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