भाषा विचार की पोशाक है। - डॉ. जानसन।
विद्या | Motivational - भारत-दर्शन संकलन  
   Author:  भारत-दर्शन संकलन

नागार्जुन आयुर्वेद के प्रख्यात आचार्य थे। एक बार शैक्षणिक सत्र समाप्त होने पर उन्होंने अपने दो प्रिय शिष्यों के व्यावहारिक ज्ञान की परीक्षा लेने की ठानी।

उन्होंने अपने प्रिय शिष्यों में से एक को ‘ज्वर' तथा दूसरे को ‘चोट' की दवा लाने को कहा।

दोनों शिष्य आचार्य के पास दवा लेकर लौट रहे थे कि एक शिष्य को रास्ते में ज्वर से पीड़ित व्यक्ति मिला। उसने अपने ज्वर की दवा रोगी को पिला दी, जिससे वह शीघ्र ठीक हो सके। शिष्य अब बिना दवा के ही गुरू के पास लौट चला।

दूसरे शिष्य को चोट से कराहता एक बच्चा मिला, पर उसे परीक्षा का ध्यान ही रहा और वह उस कराहते बालक को अनदेखा कर आगे बढ़ गया।

दोनों शिष्य जब आचार्य के पास पहुंचे तो एक के हाथ में दवा थी और दूसरे का हाथ खाली था। आचार्य ने खाली हाथ लौटे शिष्य की सराहना की। वैद्य का कर्तव्य है कि वह रोगी का तुरंत उपचार करे।

[भारत-दर्शन संकलन]

 
 

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